सोनभद्र के समाजवादी

january_ jun 2025 
Asuvidha




अंगारों पर चलते हुए

अंगारों पर चलता हुआ जनपद है सोनभद्र। सोनभद्र किसी चिड़या की तरह शान्त, स्थिर,समूह मन है, समूह गति है, समूह धारा है प्रतिकारहीन है, प्रतिकारहीन इसलिए क्योंकि सोनभद्र इतिहास को बदल देने के लिए उससे बदला नहीं लेना चाहता। यह सच है कि वह अपने समय को बदलना चाहता है। मन ठीक है तो हर ओर अमन ही अमन है। मन और अमन के बीच की ताकतें हमेशा सोनभद्र के सामूहिक मन को यहां के पहाडों की तरह सत्ता का डायनामइट लगा कर तोड़ती रही हैं। इसीलिए अमन की चाह रखने वाला सोनभद्र अद्भुत तथा जटिल स्थान बना दिया गया है, सामान्य नहीं है। यहां आदमी नहीं पहाड़ बोलते हैं, चिल्ला चिल्ला कर बोलते हैं, टूटते, दरकते, भसकते बोलते हैं, गिट्टी, सीमेन्ट, ढोका पटिया बन जाने के बाद भी बोलते हैं। उनके राग में राग मिलाते रहते हैं खुद में सिमटे हुए यहां के जंगल, कभी करमा की शोक-धुन में विलाप करने लगते हैं तो कभी कानून की मदत से दमन का संगीत गुनगुनाते हुए निरीह तथा लाचार आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल करने लगते हैं। इसी जंगल में जाकर कुछ भावुक किस्म के लोग अपने गीतों के मुखड़े की खोज करने लगते हैं तो वैज्ञानिक मिजाज के लोग जमीन के भीतर छिपे हुए किसिम किसिम के खनिजों की पहचान करते हुए उनके निकासी और बिक्री के बारे में सोचने लगते हैं। उनके दिमाग को बाजार अपने नियमों के हिसाब से अनुकूलित करने लगता है फिर तो उनके चेहरों पर चिमनियॉ उछल-कूद करने लग जाती हैं। 
वैज्ञानिकों के चेहरों पर चिमनियों का नाचना-गाना किसी विकासात्मक महाकाव्य की रूप-रेखा की तरह होता है। गनीमत है कि यहां की नदियॉ प्रतिकूलताओं का पानी कहीं नहीं फैलातीं किसी तबाही की शक्ल में, न ही उनकी लहरें किसी परिक्षेत्रा को डुबो कर अपना सिंगार करती हैं पर कामना करती रहती हैं कि उनकी उन्मुक्त लहरों को बांध न दिया जाये। उनके गीत-संगीत को कथित विकास-मूलक परियोजनायें लील न लें फिर वे अपनी लहरों का संगीत कहां गायेंगी। चाहे कुदरती लीला हो सत्ता-प्रबंधन की लीला हो सोनभद्र खामोश रहता है मजा यह कि हताश नहीं। खामोशी में भी सोनभद्र का जो पहाड़ी मन है वह बार बार बोलता रहता है कि कुछ भी कर लो पहाड़ पर बसने के लिए पहाड सा कलेजा चाहिए, पहाड़ सी ऊॅचाई चाहिए, मौसम के कठोर हमलों से टकराने के लिए मजबूत कलेजा चाहिए तन तो चाहिए ही चाहिए। तो यह जो सोनभद्र है सामूहिक मन और सामूहिक गति वाला परिक्षेत्रा है, अक्सर खामोशी पीने वाला पर जब बोलता है तब लक्ष्मण सिंह, जूरा महतो तथा बुद्धू भगत की तरह बोलता है और अंग्रेजी सल्तनत की सांसें  हवा में टंग जाया करती थीं पर अब हुकूमत की सांसे हवा में नहीं टंगतीं क्योंकि लक्ष्मण सिंह तथा जूरा आदि हमारे पुरखे अतीत के आख्यान बन चुके हैं फिर भी।  
सोेनभद्र का पहाड़ी माफिक सामूहिक मन हताश तो तब भी नहीं था जब विजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह को क्रूर अंग्रेजी सेना पछिया रही थी। उनका अपराध मात्रा इतना था कि वे अपनी रियासत को अपनी मानते तथा समझते थे, उनका यह मानना तथा समझना कि वे राजा हैं विजयगढ़ के वह भी खानदानी। यह उनकी समझ अंग्रेजों के लिए हुकुमउदूली थी। जो 1858 वाले समय के लिए बहुत बड़ा अपराध था आज के समय के देश-द्रोह वाले देशी मुहाविरे से काफी गंभीर और जटिल था। आखिर तुम बोल कैसे सकते हो? तुम्हंे बोलना आता है तब भी चुप रहो, चुप रहने को जीवन जीने तथा जीते रहने की कला बना लो इसी कला के सहारे अपना सिंगार करो, अपना दुलार करोे। अंग्रेजों के खिलाफ अपनी सोच कैसे बना सकते हो, सोचना तुम्हारा काम नहीं है, तुम्हारा काम है जनता से लगान वसूल करना और रियासत में अमन-चैन बनाये रखना। तुम्हें मान और जान लेना चाहिए कि तुम चुप रहने की कला सीख लोगे तो यह जो जनता है नऽ वह तो फटाफट सीख लेगी वैसे भी तुम्हें जानना चाहिए कि अंग्रेजी हित ही तुम्हारा हित है, अंग्रेजी सोच ही तुम्हारी सोच है। वैसे यह रियासत तुम्हारी है जरूर पर तुम इस रियासत के राजा के रूप में केवल एक रखवाले हो, देख-रेख करने वाले,     विधाता नहीं हो, विधाता है अंग्रेजी हुकूमत।’  
यह सोनभद्र हताश उस समय भी नहीं था जब कुॅअर सिंह जी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अंगारों पर चलते हुए सैन्य-विद्रोह करने के लिए पूरे देश में जागरूकता अभियान चला रहे थे। उसी सिलसिले में वे राजा लक्ष्मण सिंह की कोठी पर भी आये थे लक्ष्मण सिंह की सहायता करने के लिए। पर अंग्रेजों के लिए दिक्कत थी कि वे लक्ष्मण सिंह को बोलता हुआ नहीं देख सकते थे, उन्हें अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सचेत व जागरूक नहीं देख सकते थे, उन्हें एक आज्ञाकरी गूंगा राजा चाहिए था जो उन्हें जमीनदारी का लगान देता रहे केवल इतना ही पर जो उस समय का समय था वह आजाद होने की मानसिक आग लगाने वाला था, वह आग लगा भी चुका था, वही आग धधक रही थी लक्ष्मण सिंह के दिल में फिर एक दिन उन्होंने लगान वसूल करने वाले अंगेजी हुकूमत के तहसीलदार को ही गिरफ्तार करवा कर अपनी छोटी सी जेल में डलवा दिया। 
फिर क्या हुआ होगा यह इतिहास में उतरने तथा गोता लगाने का विषय है फिर भी समझा जा सकता है कि लक्ष्मण सिंह पर इतना तो हुआ ही होगा कि उन्हें अंग्रजांे ने घेर लिया होगा, बर्बर दमन किया होगा। लक्ष्मण सिंह वह प्रतिरोध तब करते हैं जब उस समय यहां कोई विचार-धारा नहीं थी, हमल तथा हमलों का आक्रान्त समय था, वह युग पूरी तरह से विचारों के अंत वाला युग था। उस काल  को आधुनिक वैचारिकों ने इतिहास के अंत के रूप में वर्णित किया है इतिहास के अंत का एक रूप सत्राहवीं, अठ्ठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में दिख रहा था खासतौर से आजादी के पहले। संभव है उसी चुप्पी वाले रूप को यानि प्रतिरोध हीन समय को आधुनिक वैचारिकों ने इतिहास के अंत के रूप में माना हो। 
आइए आगे बढ़ते हैं और महसूस करने की कोशिश करते हैं कि हम सभी सभ्य समाज के अनिवार्य लोग हैं, अगर हमें समाज की जरूरत है तो समाज को भी हमारी जरूरत है। थोड़ा मनबढ़ई करते हुए हमें मान लेना चाहिए कि यह जो देश है जिसमें हम रहते हैं वह हमारा है, हम जनता नहीं मालिक हैं इसके। यह अलग बात है कि लक्ष्मण सिंह अपनी रियासत के खानदानी मालिक होते हुए भी मालिक नहीं रह पाये थे, उन्हें बगावत करनी पड़ी थी जो प्रतिरोध का विनम्र रूप था। वे राजा नहीं थे तो क्या हुआ पर हम मालिक हैं इसी प्यारी अनुभति के साथ हमें जीना आना चाहिए और शायद हमें जीना आ भी गया है। 
हम अपनी आजादी महसूस करते हुए सोनभद्र की तस्वीर बना सकते हैं और हमें बनाना भी चाहिए। बनाई जाने वाली तस्वीर में मनवांक्षित रंग भर सकते हैं, लाल, पीला, नीला कुछ भी। भरने को तो हम उसमें केशरिया या भगवा रंग भी भर सकते हैं तिरंगे के रंगों से अलग या उसके साथ। रंग भरते हुए हमें केवल यह ध्यान रखना होगा कि चाहे जो रंग हम उसमें भरें पर सोनभद्र की अस्मिता बची रहे, मर्यादा बची रहे। ऐसा करने के लिए जरूरी होगा कि हम अपने उन नायकों केे पसंदीदा रंगों के बारे में भी गुनें कि उन्हें कौन रंग पसन्द था इसके लिए हमें अतीत में जाना होगा...आइए चलते हैं उस तरफ यानि कि अपने व्यतीत की तरफ जो अतीत बन चुका है...अतीत में से रंग निकालने के लिए अतीत को वर्तमान बनाना होगा... अतीत को वर्तमान बनाने के लिए हमंे अपनी उत्सुकताओं को शिथिल करना होगा। चलिए ऐसा भी कर लेते हैं और अतीत की तरफ लौट जाते हैं... बहुत पीछे लौटना मैं समझता हूं उचित नहीं होगा उचित इसलिए नहीं होगा क्योंकि हमें यह सुनिश्चित करने में दिक्कत हो सकती है कि हम सोनभद्र को कहां से देखें। क्या उस समय से जो हमारे लिए कभी आनन्दमूलक या कष्ट मूलक सपनांे वाले थे, या उस तरफ जो हमल वाले था या हमलों वाले थे। या फिर हम अतीत के उन हितोपदेशों वाले कालखण्ड की तरफ लौटंे उनके आख्यानों को समकालीन बनायें जो हमें ‘सत्य’ अहिंसा, अचौर्य की शिक्षा देते हैं जिनका मूल आशय हुआ करता था कि खुद को बदलो फिर समाज खुद बखुद बदल जायेगा। दोनो तरह के अतीत हमारे सामने हैं जो इतिहासकारों तथा राजनीतिज्ञों की गठजोड़ों से बनाये गये हैं और किताबों की शोभा बढ़ाते जैसे प्रतीत होते हैं। उनमें हमारे मन के लिए बहुत कुछ सार्थक तथा बहुत कुछ निरर्थक जैसा मिल जायेगा। वैसे यह सच है कि अतीत को जानना प्रलोभनकारी हो भी सकता है और नहीं भी पर मेरा मानना है कि वह वर्तमान को निराश ही करता है और भविष्य के रास्ते पर बाधायें खडी़ करता है। अतीत से मिठास निकालने का काम खासतौर से वे लोग कर सकते हैं जो समकालीनता की चुनौतियों से पलायन करना अपनी कार्य-योजना बना चुके होते हैं। पर वे लोग जो समकालीन चुनौतियों से टकराना चाहते हैं और उसे ही लक्ष्य बना चुके हैं वे तो वैसा करेंगे ही। सवाल है कि क्या आज की तरह ही हमें उन बीते कालखण्डों के राजनीतिक तथा तथा सामाजिक प्रबंधन के अतीत को पुनर्मूल्यांकित करना होगा? मेरा मानना है पीछे लौटकर हमें बहुत कुछ नहीं मिल पायेगा जो हसीन तथा आनन्दमूलक हो तथा जो हमारे वर्तमान से टकराने की ताकत दे सकने वाला हो। हमारा अतीत वैसे भी इतिहासकारों के जटिल विमर्शों के कारण अपनी बोधगम्यता एवं सरलता गवां चुका है। अतीत के कुछ नायक प्रतिनिधियों को केन्द्र में रख कर जो इतिहास के पाठ रचे व सिरजे गये हैं किसी कोलाज की तरह की अनुभूति कराते हैं जो देखने में भले ही खूबसूरत दिखें पर उसकी खूबसूरती विमर्श की अतिबौद्धिकता के कारण मैली मैली सी दिखती है।      

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